Homeलाइफ Styleबच्चे की मांसपेशियों से जुड़ी है स्पाइनल मस्कुलर एट्रोफी बीमारी, जानिए लक्षण

बच्चे की मांसपेशियों से जुड़ी है स्पाइनल मस्कुलर एट्रोफी बीमारी, जानिए लक्षण

हाइलाइट्स

स्पाइनल मस्कुलर एट्रोफी मांसपेशियों को कमजोर कर देती है.
बीमारी के गंभीर होने पर बिना सहारे बैठ, चल नहीं पाता मरीज.

Spinal muscular atrophy: स्पाइनल मस्कुलर एट्रोफी एक गंभीर बीमारी है जो सबसे अधिक शिशुओं और छोटे बच्चों को प्रभावित करती जिसे एसएमए नाम से भी जानते हैं. एसएमए के शिकार बच्चे अपनी मांसपेशियों का उपयोग सही प्रकार से नहीं कर पाते हैं, क्योंकि यह बीमारी उनकी रीड़ की हड्डी में नर्व सेल्स को खराब कर देती है. जिसके कारण दिमाग उन सेल्स को संदेश भेजना बंद कर देता है, जो मांसपेशियों को नियंत्रित करती हैं. एसएमए में बच्चों की मांसपेशियां पूरी तरह कमजोर और सिकुड़ जाती हैं, जिससे स्थिति कई बार इतनी खराब हो जाती है कि पीड़ित बिना सहारे के बैठ और चल भी नहीं पाता है. बीमारी में अधिकतर उन्हे निगलने और सांस लेने में कठिनाई का सामना करना पड़ सकता है.

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स्पाइनल मस्कुलर एट्रोफी के लक्षण

टाइप 0
वेब एमडी के मुताबिक ये एसएमए का सबसे भयानक और गंभीर रूप होता है. यह मां के गर्भ से ही विकसित हो जाता है, जिससे बच्चे या तो गर्भ में ही मर जाते हैं या वीक मसल्स टोन, जोड़ों की समस्याओं, कमजोर मांसपेशियों या सांस की परेशानियों के साथ पैदा होते हैं. ऐसे बच्चे बहुत कम जीवित रह पाते हैं.

टाइप 1
यह भी एसएमए का एक गंभीर प्रकार है, जिसमे बच्चा बिना सहारे के ना तो बैठ पाता है और ना ही अपने सिर को सपोर्ट कर पाता है. इस स्थिति में उनके हाथ पैर काम नहीं करते हैं और निगलने में भी कठिनाई हो सकती है.

टाइप 2
टाइप 2 अधिकतर 6 से 18 महीने के बच्चों में पाया जाता है, यह थोड़ा कम गंभीर होता है जिसमें आम तौर पर बच्चे के पैर और हाथ अधिक प्रभावित होते हैं.

टाइप 3
टाइप करीब 2 से 17 वर्ष के बच्चों में अधिक पाया जाता है,जो एसएमए का सबसे हल्का प्रकार माना जाता है.जिसमे बच्चे को ढूंढने में समस्या हो सकती है लेकिन वह आसानी से बिना सहारे के खड़े हो सकते हैं.

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टाइप 4
एसएमए का यह प्रकार किशोरों को प्रभावित करता है, जिसमे मांसपेशियों में कमजोरी सांस लेने में तकलीफ जैसे लक्षण होते हैं. यह आमतौर पर पीड़ित के हाथों और पैरों को प्रभावित करता है, इसमें व्यक्ति दवाइयों और व्यायाम के सहारे बेहतर हो सकता है.

Tags: Child Care, Health, Lifestyle

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